Wednesday, 24 June 2020

चीन के सामने भारत सरकार मजबूर क्यों??



🖋️ लोकनाथ कालमेघ

लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास कई क्षेत्रों में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति बरकरार है और 2017 के डोकलाम गतिरोध के बाद यह सबसे बड़ी सैन्य तनातनी दिखायी देती है. चीनी सैनिकों द्वारा कई बार घुसपैठ की गई है. यह चिंता की बात है. यह सामान्य गतिरोध नहीं है. यह परेशान करने वाला मामला है. फिर भी हमारी सरकार है के बीते छह सालों से चीनी उत्पादनों के भरोसे अपने तथाकथित 'मेक इन इंडिया' का नगारा पीट रहीं है. भले ही चीन के बहिष्कार का नारा दिया जा रहा हो, लेकिन सच्चाई ये है कि भारत की चीन पर निर्भरता लगातार बढ़ती ही जा रही है। 2017 में हुए डोकलाम विवाद में भी ऐसा ही नारा दिया गया था, लेकिन पिछले चार सालों में चीनी प्रॉडक्ट के आयात में तेजी आई है।
देश के प्रधानमंत्री मोदी तो भारत-चीन संबंधों को विकसित करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की बात करते थे। अब इस पार्श्वभूमी पर जरा देखतें हैं कि किस तरह से भारत सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को चायना पर निर्भर कर दिया हैं। सीमा पर हर बार विवाद के बाद चीन पर निर्भरता कम करने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं।
सबसे पहले तो 2014 में चीन के साथ बेहतर व्यापारिक रिश्ते कायम करने के लिए हाल ही में बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर के चीन के प्रस्ताव पर भारत ने सहमति जताई। बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत, बांग्लादेश, चीन एवं म्यांमार के बीच रेल एवं सड़क संपर्क परियोजना है, जिसके तहत चीन के यून्नान प्रांत को मंडाले, ढाका एवं चटगांव होते हुए पश्चिम बंगाल के कोलकाता से जोड़ा जाएगा।
विश्व में पांचवे स्थान पर मौजूद चीन के एक बैंक को भारत में अपनी शाखाएं खोलने की मंजूरी मिल गई है। 2018 में इसको लाइसेंस मिल गया था।  भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक ऑफ चाइना को मंजूरी देते हुए इसे आरबीआई एक्ट, 1934 के दूसरे शेड्यूल में डाल दिया है। 2018 में एससीओ(Shanghai Cooperation Organisation) समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इसका वादा किया था। इससे पहले भी इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना  जनवरी 2018 से भारत में बिजनेस शुरू कर चुका है।
2017 में डोकलाम विवाद के बाद भी फार्मा सेक्टर ने चीन पर निर्भरता कम करने आयात में कमी लाने की बात कही थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ, बल्कि तब से अब तक चीन से फार्मा आयात में बढ़ोतरी हो गई है। कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, 2015-16 में चीन से 947 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात हुआ था, जबकि 2019-20 में यह आयात 1150 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। इसके अलावा इस अवधि में मिश्रित फार्मा उत्पादों का आयात 58 फीसदी बढ़कर 276 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, भारत एक साल में चीन से 15,250 करोड़ रुपए के फार्मा इंग्रीडेंट्स, केमिकल और अन्य मेटेरियल का आयात करता है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत के 70 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडेंट (एपीआई) चीन से आयात करता है। इसमें एंटी इनफेक्टिव और एंटी कैंसर मेडीकेशन शामिल हैं। इंडस्ट्री के मुताबिक, पेंसिलिन और एजिथ्रोमाइसिन जैसे उत्पादों के लिए भारत 80-90 फीसदी तक आयात पर निर्भर है।
हास्यास्पद स्थिती तो ये हैं कि, चीन हमसे 3,839 करोड़ का स्टील लेकर 12 हजार करोड़ के स्टील प्रोडक्ट हमें बेच देता है
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 20 साल में चीन से हमारा आयात 45 गुना बढ़ा, भारत से कच्चा स्टील खरीद उससे प्रोडक्ट बनाकर चीन हमें ही सप्लाई करता है। हैं ना हसने वाली बात?
2018 में झारखंड के गोड्डा में 1,600 मेगावाट के अडानी पावर प्लांट का निर्माण चीन की कंपनी सेप्को-थ्री ने कराया। मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड के दौरे पर आये थें। इस दौरान उन्होंनें हीं चायना के भरोसे बनाएँ पावर प्लांट का औपचारिक शिलान्यास किया था।
जब डोकलाम विवाद उभर कर आया था, तभी यानें 2017 को चीन की ईस्ट होप ग्रुप कंपनी ने अडाणी ग्रुप के साथ मिलकर भारत में मुंद्रा एसईजेड में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए 30 करोड़ डॉलर का निवेश किया। हसी की बात तो यह थी, की भारत के चाटुकार मीडिया ने चायना के भरोसे बनाए़ उस प्लांट को 'मेक इन इंडिया कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम' ऐसे शीर्षक के नीचे बडी़ बडी़ न्यूज दिखाईं थी।
भारत-चीन के सैनिकों के बीच 15 जून की रात लद्दाख की गलवान वैली में हुई हिंसक झड़प में 20 जवान शहीद हुए थे। इस हादसे के बाद जनता लगातार केंद्र सरकार से जवाब की मांग कर रही है। दरअसल, सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने अपनी छवि राष्ट्रवादी की बनाई है। उनके कई नेता अक्सर चीन के खिलाफ बयान देते हुए और ट्विटर पर लिखते हुए भी पाए जाते हैं। लेकिन अब जनता चाहती है कि चीन के खिलाफ सरकार और उसके नेताओं की बाते भाषणों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर हकीकत का का अमली जामा पहनें। लेकिन क्या ये होना संभव है!
हर साल मौके देख कर भारतीय जनता पार्टी, उस से जुड़े संगठन और वैचारिक तौर पर उस से सहमती रखने वाले संगठन चीन के सामान को सड़क पर आग लगाकर अपना गुस्सा दिखाते हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन लोगों के कार्यों को महत्व दिया है! आंकड़ें देखकर ऐसा नहीं लगता है।
इस समय दोनों देशों के बीच कूटनैतिक और सामरिक स्तर पर गतिरोध पाया जाता है मगर इकानोमी और टेक्नालोजी को देखिए तो दोनों देशों के संबंध बहुत मज़बूत हैं।
चीन ने भारत के टेक्नालोजी सेक्टर में पिछले पांच साल के दौरान महत्वपूर्ण पोज़ीशन हासिल कर ली है। इंडियन फ़ारेन पालीसी थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपनी महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड में तो भारत को शामिल होने पर तैयार नहीं कर पाया लेकिन भारत के टेक्नालोजी सेक्टर को चीन ने अपने सस्ते स्मार्टफ़ोन से पाट दिया है। ज़ियाओमी और ओप्पो जैसे ब्रांड इंडियन स्टार्ट-अप्स में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं। गेटवे हाउस का अनुमान है कि 2015 से चीनी कंपनियों ने भारतीय स्टार्ट-अप्स में लगभग अरबो डालर का निवेश कर डाला है।
भारत इस समय चीन से जितना सामान इमपोर्ट करता है उतना किसी भी अन्य देश से नहीं करता। पिछले एक दशक के दौरान भारत और चीन ने टेक्नालोजी पावर हाउसेज़ के क्षेत्र में मज़बूती से उभरने में एक दूसरे की मदद की है। चीन की हाई टेक कंपनियों ने भारत के बड़े स्टार्ट-अप्स में अरबों डालर का निवेश किया है। चीन की समार्टफ़ोन कंपनियां भारत के बाज़ार में छायी हुई हैं जबकि टिकटाक जैसे चीनी एप्स भारतीय उपभोक्ताओं में धूम मचाए हुए हैं। इतना ही नहीं, अब तो बीजेपी भी अपना प्रचार टिकटॉक पर ही करती हैं।
तो अब जनता जानना चाहती हैं की, हमारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जो डोकलाम विवाद के बाद भी चायना का बॉयकॉट करने के बजाय चायनिज सामान आयात करनें में ही हमने धन्यता मान लीं? सरकार इस बात पर मूँह खोले..।

लोकनाथ कालमेघ,

पत्रकार एवं सामाजिक-राजकीय विश्लेषक,
व्हॉट्सऍप - 09096494894
इमेल - loknathkalmegh@gmail.com

Thursday, 18 June 2020



चीनच्या आधी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमांच्या मुसक्या आवळा...

🖋️ लोकनाथ काळमेघ

🔴 चीनच्या मुजोरीनंतर प्रत्यक्ष ताबारेषेवर झालेल्या संघर्षात तेलंगणमधील कर्नल संतोष बाबू (३७) यांच्यासह २० भारतीय जवानांना वीरमरण आले आहे. सर्वप्रथम या सर्व शहिदांना विनम्र अभिवादन!
🔴 त्यानंतर २० भारतीय जवानांचे प्राण घेणाऱ्या चीनने पुन्हा एकदा भारताला हायड्रोजन बॉम्बची धमकी दिलीय.
🔴 अशातच एक महत्त्वाची बाब आम्ही दुर्लक्षित करता कामा नये. ती म्हणजे कर्नल संतोष बाबू यांचे वडील बी उपेंद्र यांच्याशी 'टाईम्स अॉफ इंडिया'ने बातचीत केली तेव्हा बी उपेंद्र म्हणाले की, जेव्हा संतोष बाबू यांच्याशी फोनवर शेवटचे संभाषण झाले, तेव्हा संतोष सांगत होते, की “तुम्ही भारत चीन सीमेवरील लढाई संघर्षाबद्दलच्या ज्या बातम्या टीव्हीवरुन पाहत आहात, त्या धादांत खोट्या आहेत. ग्राऊंड रिॲलिटी काही औरच आहे.( https://timesofindia.indiatimes.com/city/hyderabad/india-china-border-tensions-parents-were-looking-forward-to-colonel-santosh-babus-posting-in-hyderabad/articleshow/76417207.cms ) याचा अर्थ असा होतो की, ज्या इलेक्ट्रॉनिक माध्यमांद्वारे २४ तास राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय स्तरावरील अपडेट्स जनता ऐकत असते, तीच माध्यमे जनतेची पूर्णतः दिशाभूल करीत आहेत. मीडिया चॅनेल्स सतत सांगत होते की, चीनने भारताच्या भूमीवर घुसखोरी केलीच नाही. जेव्हा की, कुरापतखोर चीन गालवान व्हॅलीमध्ये, फिंगर ४मध्ये, म्हणजेच भारताच्या जमिनीवर तब्बल आठ किमी. आतमध्ये घुसला आहे. हे दुसरे कोणी नव्हे, तर विदेश मंत्रालयाकडून मिळालेल्या माहितीनुसार स्पष्ट झाले आहे. सदर बातमीत विदेश मंत्रालयाने दिलेली माहिती आहे.( https://www.indiatoday.in/india/story/china-departed-from-consensus-on-respecting-lac-in-galwan-valley-mea-1689644-2020-06-16 )
🔴 भारताचे २० सैनिक ज्या ठिकाणी शहीद झाले, तो परिसर लद्दाखमध्ये आहे. याचेच नाव गालवान घाटी आहे. गालवान घाटी अक्साई क्षेत्रात येते, ज्याबद्दल भारत नेहमी सांगत आला आहे की, अक्साई हा भारताचा भाग आहे.
🔴 'बिझनेस स्टँडर्ड'चा एक नवीन रिपोर्ट सांगतो की, त्याठिकाणची परिस्थिती अजूनही तणावसदृश्य आहे.( https://www.business-standard.com/article/current-affairs/galwan-valley-clash-20-indian-soldiers-killed-in-face-off-with-china-120061700059_1.html ) या रिपोर्टनुसार 'पांगोंग त्सो सेक्टर'मध्ये चिनी सैन्याने फिंगर ४ पर्यंतचा प्रदेश ताब्यात घेतला असून भारतीय जमिनीच्या ८ किमीपर्यंत ताबा केला आहे, कारण भारत सांगत आला आहे की, प्रत्यक्ष नियंत्रण रेषा(एलएसी) फिंगर ८पर्यंत आहे. इतकेच नव्हे, तर गॅलवान नदी क्षेत्रातील पीपी १५ आणि पीपी १७ पर्यंतचा परिसरही चीनने ताब्यात घेतला आहे.
🔴 अशी परिस्थिती असतानाही भारतातील दलाल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खोट्या बातम्या प्रसारित करीत आहेत. ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे कधी सांगतात की चीनचे सैन्य नियंत्रण रेषेवरून माघारले, तर कधी सांगतात की मोदींनी चीनला इशारा दिलाय. चाटुकारितेपुढे वस्तूस्थिती सांगण्याची धमक या चॅनेल्समध्ये नाहीच.
🔴 चीनला धडा शिकविण्यासाठी चीनी वस्तूंवर बहिष्कार टाका, अशा बातम्या दाखवणारी हीच इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे होत. पण जरा आपण त्यांच्या बातम्यांखालील जाहिरातींवर नजर टाकली, तर Oppo, Vivo, Skyworth, यांसारख्या कंपन्यांच्या जाहिराती या दलाल इलेक्ट्रॉनिक चॅनेल्सवर असतात. आजही आपण यु-ट्यूबवर जाऊन ‘इंडिया टुडे’, ‘झी न्यूज’, ‘आज तक’, ‘टाईम्स नाऊ’, ‘रिपब्लिक टीव्ही’, यांसारख्या अनेक चाटूकार चॅनेल्सवरील जुन्या बातम्या तपासल्या, तर खाली चीनी कंपन्यांच्या जाहिराती असतात.
🔴 अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी, अंजना ओम कश्यप, यांसारखे अनेक भामटे अँकर चीनी वस्तूंवर बहिष्कार घालण्याच्या जोरदार डिबेट रंगवतात, तर त्यांच्याच खाली चीनी वस्तूंच्या जाहिरातींनी स्क्रीन रंगलेली असते.
🔴 एकीकडे जेव्हा भारत-चीन सीमेवर तणावाचे वातावरण असल्याकारणाने चीनी वस्तूंवर बहिष्कार टाकण्याची मागणी देशात जोर धरु लागली आहे. स्वदेशीचा नारा द्यायला सुरुवात झाली आहे. मात्र, केंद्रातील मोदी सरकारने दिल्ली-मेरठ सेमी हाय स्पीड रेल कॉरिडॉरचे कंत्राट चीनी कंपनीला देत स्वदेशी नाऱ्यावर पाणी ओतलं आहे.
🔴 भारत-चीन सीमेवर तणाव असूनही देशात चिनी वस्तूंवर बहिष्कार घालण्याची स्वदेशी चळवळ जोरात सुरू आहे, तरी चिनी कंपन्यांचे वर्चस्व कमी होत नाहीय. 'दिल्ली-मेरठ सेमी हाय स्पीड रेल कॉरिडॉ'रचं कंत्राट केंद्र सरकारकडून एका चिनी कंपनीला मिळणार आहे. १ हजार १२६ कोटींचं कंत्राट चीनच्या 'शांघाय टनेल इंजिनियरिंग को. लिमिटेड' या कंपनीला दिलं आहे.
🔴 एकीकडे सरकार चीनी कंपन्या सोडायला तयार नाही आणि दुसरीकडे दलाल चाटूकार इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे चीनच्याच जाहिरातींवर आपले पोट भरत आहेत.
🔴 देशातले सत्तेशी संबंधित जवळपास ९९% इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे सारेच खूपच बरबटलेले असल्याने खोट्या आणि वस्तूस्थितीवर आधारित नसलेल्या बातम्या प्रसारित करताना दिसत आहेत. जनतेला सांगायला चीनी वस्तूंवर बहिष्कार घाला आणि आपल्या चॅनेलवर चीनी कंपन्यांच्या जाहिराती दाखविण्याची लबाडी ही माध्यमे करीत आहेत.
🔴 कर्नल संतोष बाबू यांचे वडील बी उपेंद्र यांच्याशी 'टाईम्स अॉफ इंडिया'ने चर्चा केली तेव्हा बी उपेंद्र सांगतात की, संतोष बाबू यांच्याशी फोनवर शेवटचे संभाषण झाले, तेव्हा संतोष सांगत होते, की “तुम्ही भारत चीन सीमेवरील लढाई संघर्षाबद्दलच्या ज्या बातम्या टीव्हीवरुन पाहत आहात, त्या धादांत खोट्या आहेत, त्यावर विश्वास ठेऊ नका, कारण ग्राऊंड रिॲलिटी आमची आम्हालाच माहिती आहे. देशासाठी प्राणाची आहूती दिलेल्या या सच्चा देशभक्ताने शेवटचे वाक्य आपल्या वडिलांजवळ बोलताना संतोष यांनी एकप्रकारे दलाल इलेक्ट्रॉनिक मीडियाचा खोटेपणा आपल्या वडिलांना सांगितला होता. त्यामुळे ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमे बनावट चित्र उभे करून बेताल बातम्या दाखवत असतील, तर प्रथम या चॅनेल्सवर बहिष्कार टाकायला हवा. खऱ्या संकटाचे मूळ ही माध्यमेच आहेत.