🖋️ लोकनाथ कालमेघ
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास कई क्षेत्रों में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति बरकरार है और 2017 के डोकलाम गतिरोध के बाद यह सबसे बड़ी सैन्य तनातनी दिखायी देती है. चीनी सैनिकों द्वारा कई बार घुसपैठ की गई है. यह चिंता की बात है. यह सामान्य गतिरोध नहीं है. यह परेशान करने वाला मामला है. फिर भी हमारी सरकार है के बीते छह सालों से चीनी उत्पादनों के भरोसे अपने तथाकथित 'मेक इन इंडिया' का नगारा पीट रहीं है. भले ही चीन के बहिष्कार का नारा दिया जा रहा हो, लेकिन सच्चाई ये है कि भारत की चीन पर निर्भरता लगातार बढ़ती ही जा रही है। 2017 में हुए डोकलाम विवाद में भी ऐसा ही नारा दिया गया था, लेकिन पिछले चार सालों में चीनी प्रॉडक्ट के आयात में तेजी आई है।
देश के प्रधानमंत्री मोदी तो भारत-चीन संबंधों को विकसित करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की बात करते थे। अब इस पार्श्वभूमी पर जरा देखतें हैं कि किस तरह से भारत सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को चायना पर निर्भर कर दिया हैं। सीमा पर हर बार विवाद के बाद चीन पर निर्भरता कम करने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं।
सबसे पहले तो 2014 में चीन के साथ बेहतर व्यापारिक रिश्ते कायम करने के लिए हाल ही में बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर के चीन के प्रस्ताव पर भारत ने सहमति जताई। बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत, बांग्लादेश, चीन एवं म्यांमार के बीच रेल एवं सड़क संपर्क परियोजना है, जिसके तहत चीन के यून्नान प्रांत को मंडाले, ढाका एवं चटगांव होते हुए पश्चिम बंगाल के कोलकाता से जोड़ा जाएगा।
विश्व में पांचवे स्थान पर मौजूद चीन के एक बैंक को भारत में अपनी शाखाएं खोलने की मंजूरी मिल गई है। 2018 में इसको लाइसेंस मिल गया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक ऑफ चाइना को मंजूरी देते हुए इसे आरबीआई एक्ट, 1934 के दूसरे शेड्यूल में डाल दिया है। 2018 में एससीओ(Shanghai Cooperation Organisation) समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इसका वादा किया था। इससे पहले भी इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना जनवरी 2018 से भारत में बिजनेस शुरू कर चुका है।
2017 में डोकलाम विवाद के बाद भी फार्मा सेक्टर ने चीन पर निर्भरता कम करने आयात में कमी लाने की बात कही थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ, बल्कि तब से अब तक चीन से फार्मा आयात में बढ़ोतरी हो गई है। कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, 2015-16 में चीन से 947 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात हुआ था, जबकि 2019-20 में यह आयात 1150 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। इसके अलावा इस अवधि में मिश्रित फार्मा उत्पादों का आयात 58 फीसदी बढ़कर 276 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, भारत एक साल में चीन से 15,250 करोड़ रुपए के फार्मा इंग्रीडेंट्स, केमिकल और अन्य मेटेरियल का आयात करता है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत के 70 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडेंट (एपीआई) चीन से आयात करता है। इसमें एंटी इनफेक्टिव और एंटी कैंसर मेडीकेशन शामिल हैं। इंडस्ट्री के मुताबिक, पेंसिलिन और एजिथ्रोमाइसिन जैसे उत्पादों के लिए भारत 80-90 फीसदी तक आयात पर निर्भर है।
हास्यास्पद स्थिती तो ये हैं कि, चीन हमसे 3,839 करोड़ का स्टील लेकर 12 हजार करोड़ के स्टील प्रोडक्ट हमें बेच देता है
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 20 साल में चीन से हमारा आयात 45 गुना बढ़ा, भारत से कच्चा स्टील खरीद उससे प्रोडक्ट बनाकर चीन हमें ही सप्लाई करता है। हैं ना हसने वाली बात?
2018 में झारखंड के गोड्डा में 1,600 मेगावाट के अडानी पावर प्लांट का निर्माण चीन की कंपनी सेप्को-थ्री ने कराया। मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड के दौरे पर आये थें। इस दौरान उन्होंनें हीं चायना के भरोसे बनाएँ पावर प्लांट का औपचारिक शिलान्यास किया था।
जब डोकलाम विवाद उभर कर आया था, तभी यानें 2017 को चीन की ईस्ट होप ग्रुप कंपनी ने अडाणी ग्रुप के साथ मिलकर भारत में मुंद्रा एसईजेड में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए 30 करोड़ डॉलर का निवेश किया। हसी की बात तो यह थी, की भारत के चाटुकार मीडिया ने चायना के भरोसे बनाए़ उस प्लांट को 'मेक इन इंडिया कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम' ऐसे शीर्षक के नीचे बडी़ बडी़ न्यूज दिखाईं थी।
भारत-चीन के सैनिकों के बीच 15 जून की रात लद्दाख की गलवान वैली में हुई हिंसक झड़प में 20 जवान शहीद हुए थे। इस हादसे के बाद जनता लगातार केंद्र सरकार से जवाब की मांग कर रही है। दरअसल, सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने अपनी छवि राष्ट्रवादी की बनाई है। उनके कई नेता अक्सर चीन के खिलाफ बयान देते हुए और ट्विटर पर लिखते हुए भी पाए जाते हैं। लेकिन अब जनता चाहती है कि चीन के खिलाफ सरकार और उसके नेताओं की बाते भाषणों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर हकीकत का का अमली जामा पहनें। लेकिन क्या ये होना संभव है!
हर साल मौके देख कर भारतीय जनता पार्टी, उस से जुड़े संगठन और वैचारिक तौर पर उस से सहमती रखने वाले संगठन चीन के सामान को सड़क पर आग लगाकर अपना गुस्सा दिखाते हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन लोगों के कार्यों को महत्व दिया है! आंकड़ें देखकर ऐसा नहीं लगता है।
इस समय दोनों देशों के बीच कूटनैतिक और सामरिक स्तर पर गतिरोध पाया जाता है मगर इकानोमी और टेक्नालोजी को देखिए तो दोनों देशों के संबंध बहुत मज़बूत हैं।
चीन ने भारत के टेक्नालोजी सेक्टर में पिछले पांच साल के दौरान महत्वपूर्ण पोज़ीशन हासिल कर ली है। इंडियन फ़ारेन पालीसी थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपनी महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड में तो भारत को शामिल होने पर तैयार नहीं कर पाया लेकिन भारत के टेक्नालोजी सेक्टर को चीन ने अपने सस्ते स्मार्टफ़ोन से पाट दिया है। ज़ियाओमी और ओप्पो जैसे ब्रांड इंडियन स्टार्ट-अप्स में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं। गेटवे हाउस का अनुमान है कि 2015 से चीनी कंपनियों ने भारतीय स्टार्ट-अप्स में लगभग अरबो डालर का निवेश कर डाला है।
भारत इस समय चीन से जितना सामान इमपोर्ट करता है उतना किसी भी अन्य देश से नहीं करता। पिछले एक दशक के दौरान भारत और चीन ने टेक्नालोजी पावर हाउसेज़ के क्षेत्र में मज़बूती से उभरने में एक दूसरे की मदद की है। चीन की हाई टेक कंपनियों ने भारत के बड़े स्टार्ट-अप्स में अरबों डालर का निवेश किया है। चीन की समार्टफ़ोन कंपनियां भारत के बाज़ार में छायी हुई हैं जबकि टिकटाक जैसे चीनी एप्स भारतीय उपभोक्ताओं में धूम मचाए हुए हैं। इतना ही नहीं, अब तो बीजेपी भी अपना प्रचार टिकटॉक पर ही करती हैं।
तो अब जनता जानना चाहती हैं की, हमारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जो डोकलाम विवाद के बाद भी चायना का बॉयकॉट करने के बजाय चायनिज सामान आयात करनें में ही हमने धन्यता मान लीं? सरकार इस बात पर मूँह खोले..।
देश के प्रधानमंत्री मोदी तो भारत-चीन संबंधों को विकसित करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने की बात करते थे। अब इस पार्श्वभूमी पर जरा देखतें हैं कि किस तरह से भारत सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को चायना पर निर्भर कर दिया हैं। सीमा पर हर बार विवाद के बाद चीन पर निर्भरता कम करने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं।
सबसे पहले तो 2014 में चीन के साथ बेहतर व्यापारिक रिश्ते कायम करने के लिए हाल ही में बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर के चीन के प्रस्ताव पर भारत ने सहमति जताई। बीसीआईएम इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत, बांग्लादेश, चीन एवं म्यांमार के बीच रेल एवं सड़क संपर्क परियोजना है, जिसके तहत चीन के यून्नान प्रांत को मंडाले, ढाका एवं चटगांव होते हुए पश्चिम बंगाल के कोलकाता से जोड़ा जाएगा।
विश्व में पांचवे स्थान पर मौजूद चीन के एक बैंक को भारत में अपनी शाखाएं खोलने की मंजूरी मिल गई है। 2018 में इसको लाइसेंस मिल गया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक ऑफ चाइना को मंजूरी देते हुए इसे आरबीआई एक्ट, 1934 के दूसरे शेड्यूल में डाल दिया है। 2018 में एससीओ(Shanghai Cooperation Organisation) समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इसका वादा किया था। इससे पहले भी इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना जनवरी 2018 से भारत में बिजनेस शुरू कर चुका है।
2017 में डोकलाम विवाद के बाद भी फार्मा सेक्टर ने चीन पर निर्भरता कम करने आयात में कमी लाने की बात कही थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ, बल्कि तब से अब तक चीन से फार्मा आयात में बढ़ोतरी हो गई है। कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, 2015-16 में चीन से 947 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात हुआ था, जबकि 2019-20 में यह आयात 1150 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। इसके अलावा इस अवधि में मिश्रित फार्मा उत्पादों का आयात 58 फीसदी बढ़कर 276 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, भारत एक साल में चीन से 15,250 करोड़ रुपए के फार्मा इंग्रीडेंट्स, केमिकल और अन्य मेटेरियल का आयात करता है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत के 70 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडेंट (एपीआई) चीन से आयात करता है। इसमें एंटी इनफेक्टिव और एंटी कैंसर मेडीकेशन शामिल हैं। इंडस्ट्री के मुताबिक, पेंसिलिन और एजिथ्रोमाइसिन जैसे उत्पादों के लिए भारत 80-90 फीसदी तक आयात पर निर्भर है।
हास्यास्पद स्थिती तो ये हैं कि, चीन हमसे 3,839 करोड़ का स्टील लेकर 12 हजार करोड़ के स्टील प्रोडक्ट हमें बेच देता है
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 20 साल में चीन से हमारा आयात 45 गुना बढ़ा, भारत से कच्चा स्टील खरीद उससे प्रोडक्ट बनाकर चीन हमें ही सप्लाई करता है। हैं ना हसने वाली बात?
2018 में झारखंड के गोड्डा में 1,600 मेगावाट के अडानी पावर प्लांट का निर्माण चीन की कंपनी सेप्को-थ्री ने कराया। मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झारखंड के दौरे पर आये थें। इस दौरान उन्होंनें हीं चायना के भरोसे बनाएँ पावर प्लांट का औपचारिक शिलान्यास किया था।
जब डोकलाम विवाद उभर कर आया था, तभी यानें 2017 को चीन की ईस्ट होप ग्रुप कंपनी ने अडाणी ग्रुप के साथ मिलकर भारत में मुंद्रा एसईजेड में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए 30 करोड़ डॉलर का निवेश किया। हसी की बात तो यह थी, की भारत के चाटुकार मीडिया ने चायना के भरोसे बनाए़ उस प्लांट को 'मेक इन इंडिया कार्यक्रम की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम' ऐसे शीर्षक के नीचे बडी़ बडी़ न्यूज दिखाईं थी।
भारत-चीन के सैनिकों के बीच 15 जून की रात लद्दाख की गलवान वैली में हुई हिंसक झड़प में 20 जवान शहीद हुए थे। इस हादसे के बाद जनता लगातार केंद्र सरकार से जवाब की मांग कर रही है। दरअसल, सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने अपनी छवि राष्ट्रवादी की बनाई है। उनके कई नेता अक्सर चीन के खिलाफ बयान देते हुए और ट्विटर पर लिखते हुए भी पाए जाते हैं। लेकिन अब जनता चाहती है कि चीन के खिलाफ सरकार और उसके नेताओं की बाते भाषणों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर हकीकत का का अमली जामा पहनें। लेकिन क्या ये होना संभव है!
हर साल मौके देख कर भारतीय जनता पार्टी, उस से जुड़े संगठन और वैचारिक तौर पर उस से सहमती रखने वाले संगठन चीन के सामान को सड़क पर आग लगाकर अपना गुस्सा दिखाते हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन लोगों के कार्यों को महत्व दिया है! आंकड़ें देखकर ऐसा नहीं लगता है।
इस समय दोनों देशों के बीच कूटनैतिक और सामरिक स्तर पर गतिरोध पाया जाता है मगर इकानोमी और टेक्नालोजी को देखिए तो दोनों देशों के संबंध बहुत मज़बूत हैं।
चीन ने भारत के टेक्नालोजी सेक्टर में पिछले पांच साल के दौरान महत्वपूर्ण पोज़ीशन हासिल कर ली है। इंडियन फ़ारेन पालीसी थिंक टैंक गेटवे हाउस की रिपोर्ट के अनुसार चीन अपनी महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड में तो भारत को शामिल होने पर तैयार नहीं कर पाया लेकिन भारत के टेक्नालोजी सेक्टर को चीन ने अपने सस्ते स्मार्टफ़ोन से पाट दिया है। ज़ियाओमी और ओप्पो जैसे ब्रांड इंडियन स्टार्ट-अप्स में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं। गेटवे हाउस का अनुमान है कि 2015 से चीनी कंपनियों ने भारतीय स्टार्ट-अप्स में लगभग अरबो डालर का निवेश कर डाला है।
भारत इस समय चीन से जितना सामान इमपोर्ट करता है उतना किसी भी अन्य देश से नहीं करता। पिछले एक दशक के दौरान भारत और चीन ने टेक्नालोजी पावर हाउसेज़ के क्षेत्र में मज़बूती से उभरने में एक दूसरे की मदद की है। चीन की हाई टेक कंपनियों ने भारत के बड़े स्टार्ट-अप्स में अरबों डालर का निवेश किया है। चीन की समार्टफ़ोन कंपनियां भारत के बाज़ार में छायी हुई हैं जबकि टिकटाक जैसे चीनी एप्स भारतीय उपभोक्ताओं में धूम मचाए हुए हैं। इतना ही नहीं, अब तो बीजेपी भी अपना प्रचार टिकटॉक पर ही करती हैं।
तो अब जनता जानना चाहती हैं की, हमारी ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जो डोकलाम विवाद के बाद भी चायना का बॉयकॉट करने के बजाय चायनिज सामान आयात करनें में ही हमने धन्यता मान लीं? सरकार इस बात पर मूँह खोले..।
लोकनाथ कालमेघ,
पत्रकार एवं सामाजिक-राजकीय विश्लेषक,व्हॉट्सऍप - 09096494894
इमेल - loknathkalmegh@gmail.com
